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मड़वा नगर गैस एजेंसी की मनमानी: जनता लाइन में, साहब चैन की नींद में!

शटर डाउन, जनता परेशान: क्या मड़वा नगर एचपी गैस एजेंसी पर ताला ही समाधान है?

अजीत मिश्रा (खोजी)

  • बस्ती में ‘गैस’ के लिए हाहाकार: सुबह के 8:24 बजे तक नहीं खुला शटर, उपभोक्ताओं का फूटा गुस्सा।
  • ​सरकारी दावों की उड़ी धज्जियां: लंबी कतारों के बीच बंद मिली गैस एजेंसी, जिम्मेदार मौन।
  • ​सिस्टम फेल: मड़वा नगर में घंटों इंतजार के बाद भी नहीं मिली गैस, एजेंसी प्रबंधकों की तानाशाही चरम पर।

मड़वा नगर गैस एजेंसी पर हाहाकार: जनता बेहाल, शटर डाउन!

बस्ती। सरकार उज्ज्वला और सुलभ रसोई के चाहे जितने दावे कर ले, लेकिन धरातल पर गैस एजेंसियां आम जनता के धैर्य की परीक्षा लेने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं। ताज़ा मामला बस्ती जनपद के मड़वा नगर स्थित एचपी गैस एजेंसी का है, जहाँ शनिवार सुबह बदइंतजामी और गैर-जिम्मेदाराना रवैये की पराकाष्ठा देखने को मिली।

सुबह 8:24: जनता लाइन में, साहबान चैन की नींद में

गैस सिलेंडर के लिए सुबह की पहली किरण के साथ ही उपभोक्ताओं की लंबी कतार लग गई थी। समय सुबह के 8:24 बज चुके थे, लेकिन एजेंसी का शटर गिरने का नाम नहीं ले रहा था। दूर-दराज के गांवों से आए ग्रामीण, बुजुर्ग और महिलाएं इस उम्मीद में घंटों खड़े रहे कि शायद अब ताला खुलेगा, लेकिन एजेंसी के कर्मचारी और प्रबंधक शायद सरकारी समय सारिणी को अपनी जेब में रखकर चल रहे हैं।

आखिर जवाबदेह कौन?

यह केवल एक एजेंसी के बंद होने का मामला नहीं है, बल्कि उस कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार है जो उपभोक्ताओं के समय और श्रम को शून्य मानती है।

नियमों की अनदेखी: क्या गैस एजेंसी के संचालन के लिए कोई निर्धारित समय तय नहीं है?

उपभोक्ताओं का शोषण: घंटों लाइन में लगने के बाद भी यदि शटर बंद मिले, तो यह मानसिक और शारीरिक शोषण की श्रेणी में आता है।

प्रशासनिक मौन: स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभाग की ढील ही ऐसे प्रबंधकों का मनोबल बढ़ाती है, जो जनता को अपनी चौखट पर मजबूर देखने के आदी हो चुके हैं।

 कमीशन का खेल या लापरवाही का मेल?

मड़वा नगर की यह भीड़ चीख-चीख कर व्यवस्था की पोल खोल रही है। एक तरफ लंबी लाइनें और दूसरी तरफ एजेंसी का ‘शटर डाउन’ होना किसी बड़े खेल की तरफ भी इशारा करता है। क्या यह किल्लत जानबूझकर पैदा की जा रही है? क्या आम जनता को परेशान करना ही एजेंसी की कार्यशैली का हिस्सा बन चुका है?

उच्चाधिकारियों को इस मामले का तत्काल संज्ञान लेना चाहिए। यदि समय पर एजेंसी नहीं खुल सकती, तो ऐसे लाइसेंसों की समीक्षा होनी चाहिए जो जनता के लिए सुविधा कम और दुविधा ज्यादा बन गए हैं।

ब्यूरो रिपोर्ट:

बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश

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